तुम मुझको गलबाँही देना , मैं दूँगा संसार !
तुम रखना बस नींव प्रेम की , मैं दूँगा विस्तार !!
तुम नभ की जब ओर तकोगी , छूने की आशा में !
मैं तब साथ तुम्हारे चल कर , चुनूँगा पथ के ख़ार !!
मेरी जितनी ऊँचाई है , उतनी ऊँची तुम !
हम दोनों का एक दूसरे पर है सम अधिकार !!
प्रेम भावना होगी तब ही सफल सुखद जीवन होगा !
अमित स्नेह से ढह जाती है बीच खड़ी दीवार !!
तुम ही हो सर्वस्व , तुम ही जीवन हो , तुम हो प्राण !
तुम मेरे भावी जीवन की एकमात्र आधार !!
- संकर्षण गिरि
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शनिवार, 14 मई 2011
मेदिनी सी मुस्कान धरो...
घृणा के बोये मैंने बीज ,
उठी अंतर से करुण पुकार ,
कहीं पर सिसक उठी एक रूह ,
किसी का भूला भटका प्यार !
समय के तरकश से अक्सर ,
निकलते रहे हैं तीर अचूक ,
जिन्होंने बेधे मेरे प्राण ,
कि जिससे वाणी हो गयी मूक !
समंदर सूख गया निर्लज्ज ,
जगा कर मेरे उर की प्यास ;
भ्रमर को पत्थर से क्या काम ,
भ्रमर नीरज में करता वास !
चहक कर जैसे ही खग ने ,
पसारे अपने नन्हे पंख ,
पवन ने बदला अपना रुख ,
दिखाया आंधी का आतंक !
बरस कर बादल ने निर्झर ,
मेरे नयनों का साथ दिया ,
मृदा ने अपने कर फैला ,
बहते अश्रु को सोख लिया !
जहाँ तक दृष्टि का है प्रश्न ,
क्षितिज के देख सकता हूँ पार ,
जहाँ तक पाँव साथ देंगे ,
चुनौती है हर एक स्वीकार !
समय की विस्तृत पगडण्डी ,
कि जिस पर चलना अपना कर्म ,
भुला कर भूत के दारुण दुःख ,
मान कर प्रेम ही को निज धर्म !
घृणा के बोये हैं जो बीज ,
भविष्यत् में घातक होंगे ,
कर्म फल होगा विष से युक्त ,
सफलता में बाधक होंगे !
हुए हो कटु अनुभव तो क्या ,
मेदिनी सी मुस्कान धरो ,
खिलाओ मुरझाते चेहरे ,
नयन में नित उन्माद भरो !
बड़ा ही जीवन में अनमोल ,
बड़े ही कोमल हैं सम्बन्ध ,
भावनाओं का हो विस्तार ,
तभी सर्वत्र फैलता है सुगंध !
- संकर्षण गिरि
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