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शनिवार, 14 मई 2011

मेदिनी सी मुस्कान धरो...


घृणा के बोये मैंने बीज ,

उठी अंतर से करुण पुकार ,

कहीं पर सिसक उठी एक रूह ,

किसी का भूला भटका प्यार !


समय के तरकश से अक्सर ,

निकलते रहे हैं तीर अचूक ,

जिन्होंने बेधे मेरे प्राण ,

कि जिससे वाणी हो गयी मूक !


समंदर सूख गया निर्लज्ज ,

जगा कर मेरे उर की प्यास ;

भ्रमर को पत्थर से क्या काम ,

भ्रमर नीरज में करता वास !


चहक कर जैसे ही खग ने ,

पसारे अपने नन्हे पंख ,

पवन ने बदला अपना रुख ,

दिखाया आंधी का आतंक !


बरस कर बादल ने निर्झर ,

मेरे नयनों का साथ दिया ,

मृदा ने अपने कर फैला ,

बहते अश्रु को सोख लिया !


जहाँ तक दृष्टि का है प्रश्न ,

क्षितिज के देख सकता हूँ पार ,

जहाँ तक पाँव साथ देंगे ,

चुनौती है हर एक स्वीकार !


समय की विस्तृत पगडण्डी ,

कि जिस पर चलना अपना कर्म ,

भुला कर भूत के दारुण दुःख ,

मान कर प्रेम ही को निज धर्म !


घृणा के बोये हैं जो बीज ,

भविष्यत् में घातक होंगे ,

कर्म फल होगा विष से युक्त ,

सफलता में बाधक होंगे !


हुए हो कटु अनुभव तो क्या ,

मेदिनी सी मुस्कान धरो ,

खिलाओ मुरझाते चेहरे ,

नयन में नित उन्माद भरो !


बड़ा ही जीवन में अनमोल ,

बड़े ही कोमल हैं सम्बन्ध ,

भावनाओं का हो विस्तार ,

तभी सर्वत्र फैलता है सुगंध !



- संकर्षण गिरि

1 टिप्पणी:

  1. बड़ा ही जीवन में अनमोल ,

    बड़े ही कोमल हैं सम्बन्ध ,

    भावनाओं का हो विस्तार ,

    तभी सर्वत्र फैलता है सुगंध !

    bahut barhiya.........
    aakarshan

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