कुरुक्षेत्र की युद्ध - भूमि के समान है जीवन ,
इंसान जिसमें
महाभारत के किसी पात्र को जीता है ।
अपना सर्वस्व दे कर ,
विजय की आशा में युद्ध करता है ...
पराजित हो कर जीवन का मार्ग अवरुद्ध करता है ;
और जयी होता है तो
जीवन को संतुलित और शुद्ध करता है ।
मैंने भी जिया है कुरुक्षेत्र को ।
जीवन - समर में खड़े हो कर
भीष्म बन ...
कई बार
अपने अस्तित्व को ललकारा है मैंने ,
विवशता ने हर बार
उद्विग्न किया है मेरा ह्रदय !
आज बाण - शय्या पर लेटा हूँ !
अर्जुन का पात्र निभा रही एक ज़िन्दगी ने ,
शब्दों के बाण चलाये हैं मेरे ऊपर ...
और बिंध गया हूँ पूर्णतः ,
इस ब्रह्मास्त्र से मैं !
लहू लुहान है शरीर , छलनी है ह्रदय !
ह्रदय छलनी है क्योंकि
भीष्म के सर्वप्रिय अर्जुन को ,
विजय के अतिशय उन्माद में
ग्लानि - युक्त भाव भी नहीं आये ,
हाय , नियति ने ये कैसे दिन दिखाए !
इच्छा - मृत्यु के वरदान से वंचित हूँ ,
बाण - शय्या के साथ ही जीना है मुझे ,
शब्दों का विष आगे भी पीना है मुझे ...!
- संकर्षण गिरि
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शनिवार, 10 मार्च 2012
ग़ज़ल
जहाँ ठोकर की थी उम्मीद , वहीं पर खड़ा हुआ !
मैं ज़माने की जलती निगाहों के बीच बड़ा हुआ !!
बड़ा अनमोल हूँ लेकिन पहुँच से दूर हूँ सबकी !
मुझे वो ढूँढ लेंगे , एक खज़ाना हूँ गड़ा हुआ !!
मेरी आँखों में सपने और मेरे पाँव में छाले !
मेरे है सामने मंज़िल औ' मैं गुमसुम , डरा हुआ !!
मुझे बेशक़ बुरा समझे कोई , बिसरे कोई !
मैं अपने आप में उलझा हुआ , उखड़ा हुआ !!
बहुत ही पाक़ नज़रों से मुझे देखा किये !
मेरा महबूब मेरे रग-रग में है भरा हुआ !!
- संकर्षण गिरि
मैं ज़माने की जलती निगाहों के बीच बड़ा हुआ !!
बड़ा अनमोल हूँ लेकिन पहुँच से दूर हूँ सबकी !
मुझे वो ढूँढ लेंगे , एक खज़ाना हूँ गड़ा हुआ !!
मेरी आँखों में सपने और मेरे पाँव में छाले !
मेरे है सामने मंज़िल औ' मैं गुमसुम , डरा हुआ !!
मुझे बेशक़ बुरा समझे कोई , बिसरे कोई !
मैं अपने आप में उलझा हुआ , उखड़ा हुआ !!
बहुत ही पाक़ नज़रों से मुझे देखा किये !
मेरा महबूब मेरे रग-रग में है भरा हुआ !!
- संकर्षण गिरि
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