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शनिवार, 10 मार्च 2012

ग़ज़ल

जहाँ ठोकर की थी उम्मीद , वहीं पर खड़ा हुआ !
मैं ज़माने की जलती निगाहों के बीच बड़ा हुआ !!

बड़ा अनमोल हूँ लेकिन पहुँच से दूर हूँ सबकी !
मुझे वो ढूँढ लेंगे , एक खज़ाना हूँ गड़ा हुआ !!

मेरी आँखों में सपने और मेरे पाँव में छाले !
मेरे है सामने मंज़िल औ' मैं गुमसुम , डरा हुआ !!

मुझे बेशक़ बुरा समझे कोई , बिसरे कोई !
मैं अपने आप में उलझा हुआ , उखड़ा हुआ !!

बहुत ही पाक़ नज़रों से मुझे देखा किये !
मेरा महबूब मेरे रग-रग में है भरा हुआ !!


- संकर्षण गिरि

6 टिप्‍पणियां:

  1. जहाँ ठोकर की थी उम्मीद , वहीं पर खड़ा हुआ !
    मैं ज़माने की जलती निगाहों के बीच बड़ा हुआ !!



    बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने
    बेहतरीन प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही सुंदर भाव संयोजन से सजी खूबसूरत गज़ल...

    उत्तर देंहटाएं