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गुरुवार, 20 सितंबर 2012

टुकड़े



ज़िन्दगी को टटोल कर देखा

तो वक़्त के कुछ टुकड़े हाथ में आ गए

और टुकड़े भी ऐसे ,

कि जिनकी कोई पहचान नहीं !


ख़ुशी वाले वक़्त के टुकड़े हैं

या  ग़म के ,

आशा के हैं या निराशा को जन्म देने वाले ...

कुछ भी तो नहीं मालूम !

क्या करूँ मैं इनको ले कर ?

ज़िन्दगी की चादर अभी फटी भी तो नहीं ,

वरना कोई टुकड़ा उठा कर पैबंद ही लगा देता


ज़िन्दगी वक़्त को

पहले से कोई नाम दे कर नहीं रखती ;

ज़िन्दगी की जेब में वज़न तो है

पर है वो उसी के काम की ।

किसी जेबकतरे को रोना ही आएगा अपने नसीब पे ...

शायद इसीलिए ,

पहेली कहते हैं ज़िन्दगी को ।


बेहतर है

इन टुकड़ों को वहीं रख दूँ

जहाँ से ये हाथ लगे थे . . . !!!



- संकर्षण गिरि

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (22-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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    उत्तर

    1. Meri is kavita ko Charcha Munch par sthaan dene ke liye aapka saadar aabhaar aur sahriday dhanyawaad! :)

      हटाएं
  2. उत्तर

    1. Kshama chaahunga, main aapko aapke naam se sambodhit karne me asamarth hoon kyonki aapki tippaNi benaami hai... Shukriya protsaahan ke liye :)

      हटाएं
  3. टुकडे़ फेंके नहीं जाते हैं
    जमा कर लिये जाते हैं
    समझदार लोगों के
    द्वारा बेच भी दिये जाते हैं
    बहुत से लोग तो
    टुकदो़ का अचार बनाने
    में भी माहिर पाये जाते हैं !

    अन्यथा ना लें
    अपने अपने टुकडे़
    अपनी अपनी सोच !!

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति !!


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  4. वक्त के टुकड़े कब ठहरे हैं ,आंधी से आतें हैं तूफां से जातें हैं ,घबराना क्या इन टुकड़ों से ,जब आया तू इस काया में ,फिर खोना क्या और पाना क्या ,खोकर भी तो कुछ पातें हैं ,कब अपनों के रह पातें हैं .टुकड़े किसके मन भाते हैं .

    ram ram bhai

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  5. बहुत गहन और सुन्दर प्रस्तुति...

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  6. प्रशंसनीय प्रस्तुति - हार्दिक शुभकामनाएं और आशीष

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