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शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016


क्षमा करें जिनकी आशाओं पर मैं खरा नहीं उतरा !


निःस्वार्थ भाव से मैंने सबकी सेवा की 
बिन माँगे मैंने सबकी झोली भर दी 
ताने कितने ही सुने, सहे, किंतु  हँस कर 
मैंने वो सब ही किया मुझे जो सही लगा,
और वही जो सबको सुख दे सकता था,
और वही जो खुशियों की परिभाषा थी !
फिर भी यदि कहीं कभी कोई रह गयी कमी,
सर्वत्र अगर मैं पुष्प गंध - सा नहीं बिखरा !
क्षमा करें जिनकी आशाओं पर मैं खरा नहीं उतरा !!


जाने कितनी ही बार लँघा अपनी सीमा,
जाने कितने ही घूँट पिये अपमानों के !
पर चादर तो मैली होने के लिए बनी -
बस एक भूल भारी सौ-सौ अच्छाई पर !
बस एक कलंक माथे पर यदि लग जाए तो,
जीवन पहाड़ - सा भारी लगने लगता है,
छवि धूमिल होती और निराश मन हो जाता है । 
फिर भी पतझर के पत्तों सा मैं नहीं झरा !
क्षमा करें जिनकी आशाओं पर मैं खरा नहीं उतरा !!


- संकर्षण गिरि 

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