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शनिवार, 10 जुलाई 2010

चलता ही रहा...

चलता ही रहा , न रुकने का अवकाश मिला !

आसान रहा तो कभी रास्ता सख्त रहा ,
खोया पाया सोया जागा और मस्त रहा ,
जहाँ पर ज़मीं ख़त्म हो गयी वहीं आकाश मिला !
चलता ही रहा , न रुकने का अवकाश मिला !

दरिया को लाँघा , आँधी को दी राह और ,
एक ठिकाना नहीं , रहा मैं कई ठौर ,
गिरि की तलाश थी , तूर मिला कैलाश मिला !
चलता ही रहा , न रुकने का अवकाश मिला !

-- संकर्षण गिरि

1 टिप्पणी:

  1. कई बार गिरा, और फिर-फिर उठा किया
    कभी साथ मिला, कभी टूटा मिटा किया
    साँसें पूरी होते ही, पुनः कहीं से साँस मिला
    चलता ही रहा, ना रुकने का अवकाश मिला

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