MyBlog


View My Stats

रविवार, 24 जुलाई 2011

नयनाभिराम है दृश्य...

नयनाभिराम है दृश्य ,
क्योंकि तक रहे नयन हैं तुमको !

अखिल सृष्टि के कोलाहल में ज्यों कोकिल की वाणी ,
अंतर के सूनेपन को भरने वाली कल्याणी !
आज हिलोरें मार रहा उर पा अपनी प्रेयसी को ,
आज नयन के कोरों में उठ छलक पड़ा है पानी !

आज अलौकिकता को मैंने अपनी बाहों में घेरा ,
आज भुवन संपूर्ण मुझे दिखलाई पड़ता है मेरा ;
आज होड़ है आसमान से , इन्द्रधनुष से ,
आज चन्द्रमा को गुदगुदी लगाई , तारों को छेड़ा !

पोर - पोर में ख़ुशी ,
क्योंकि छक रहे नयन हैं तुमको !
नयनाभिराम है दृश्य ,
क्योंकि तक रहे नयन हैं तुमको !


- संकर्षण गिरि

5 टिप्‍पणियां:

  1. आज अलौकिकता को मैंने अपनी बाहों में घेरा ,
    आज भुवन संपूर्ण मुझे दिखलाई पड़ता है मेरा ;
    आज होड़ है आसमान से , इन्द्रधनुष से ,
    आज चन्द्रमा को गुदगुदी लगाई , तारों को छेड़ा !

    बहुत खुबसूरत पंक्तियां.............

    उत्तर देंहटाएं
  2. ह्रदय के भाव का काव्यात्मक चित्रण सुन्दर है

    उत्तर देंहटाएं
  3. संकर्षण भाई, आपकी कविताओं और गज़लों से दो-चार हुआ. आपमें काफी संभावनाएं दिखी. भावनाएँ बहुत अच्छी है पर शिल्प पर थोड़ी और मेहनत कि जरुरत है. आपके लेखन और जीवन के लिए मेरी ढेर सारी शुभकामनाएँ.

    उत्तर देंहटाएं