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मंगलवार, 11 जनवरी 2011

समंदर


२२ अगस्त , २००९ को चेन्नई में समंदर पहली बार महसूस करने पर...


मैंने आज समंदर देखा !

लहरों का चढ़ना - उतराना ,
लहरों का संगीत सुनाना ,
दूर क्षितिज तक जल ही जल , यह दृश्य बड़ा ही सुन्दर देखा !
मैंने आज समंदर देखा !

सीने में तूफ़ान है मगर ,
स्वागत सबके पाँव चूम कर !
ऐसा ही एक सागर मैंने अपने दिल के अन्दर देखा !
मैंने आज समंदर देखा !


- संकर्षण गिरि

मंगलवार, 18 मई 2010

जितनी सागर की लहरें हैं...


जितनी सागर की लहरें हैं , उतने ही हैं बूँद नयन में !


तब मैंने बाहें फैलायीं

लड़खड़ा रहा था जब प्रकाश ,

तब मैंने उसके दुःख बाँटे

सिमटा जाता था जब आकाश ;

मैंने पूरा सहयोग दिया

जिसकी जैसी भी व्यथा रही ,

तब आशा की किरणें लाया

जब दिखा मुझे कोई निराश !

आँसू पी कर मुस्कान बिखेरा है मैंने सबके जीवन में ।

जितनी सागर की लहरें हैं उतने ही हैं बूँद नयन में !


सब कुछ पाने के बाद भी

कुछ खोने का अहसास है !

उर क्यों अतृप्त है पता नहीं

मन क्यों इन दिनों उदास है ;

कब तलक , कहाँ तक सीधा रस्ता

मिलेगा जीवन में ,

भटक रही है सोच मेरी

मिल गया इसे वनवास है !

शिथिल - सी मेरी चाल देख ताकत - सी आई क्रूर पवन में !

जितनी सागर की लहरें हैं उतने ही हैं बूँद नयन में !



-- संकर्षण गिरि