हर्ष नव ,
जीवन उत्कर्ष नव !
नव उमंग ,
नव तरंग ,
जीवन का नव प्रसंग !
नवल चाह ,
नवल राह ,
जीवन का नव प्रवाह !
गीत नवल ,
प्रीति नवल ,
जीवन की रीति नवल !
जीवन की नीति नवल !
जीवन की जीत नवल !
- बच्चन जी !
इक अजब - सा द्वन्द्व मन में !
स्वप्न की जब सत्य से टक्कर हुई , किस्मत मेरी कुछ और भी जर्जर हुई !
छोटी - सी उम्र में बड़े अनुभव हुए , रुसवाइयाँ हुईं तो वो जम कर हुईं !
वक़्त का चेहरा बड़ा मासूम है , धोखे में रहा , गलती ये अक्सर हुई !
पत्थर है वो , पूजा के काबिल , मैं फूल, मेरी दुर्गति खिल कर हुई !
दूर से ही दीखता है चाँद निर्मल , घनघोर निराशा उसे छू कर हुई !
'गिरि' का घर लुटा , मनमीत छूटा , आइना साथी , ज़मी बिस्तर हुई !
- संकर्षण गिरि
हिंदी की कक्षा में अक्सर हमें ,
रिक्त स्थानों की पूर्ति करने को कहा जाता था...
और हम बड़े चाव से ,
सटीक शब्दों से ,
पूरा कर देते थे दिए गए अधूरे वाक्य को !
आज... जब तुम चले गए हो ,
और
तुम्हारा स्थान रिक्त हो गया है ...
कैसे पूर्ति करूँ उस अभाव की ?
कागज़ और जीवन में यही तो फर्क है ,
कागज़ को शब्द मिल जाते हैं ,
जीवन रह जाता है -
अकेला , असहाय , अपूर्ण , रिक्त ...!!!
- संकर्षण गिरि
जितनी सागर की लहरें हैं , उतने ही हैं बूँद नयन में !
तब मैंने बाहें फैलायीं
लड़खड़ा रहा था जब प्रकाश ,
तब मैंने उसके दुःख बाँटे
सिमटा जाता था जब आकाश ;
मैंने पूरा सहयोग दिया
जिसकी जैसी भी व्यथा रही ,
तब आशा की किरणें लाया
जब दिखा मुझे कोई निराश !
आँसू पी कर मुस्कान बिखेरा है मैंने सबके जीवन में ।
जितनी सागर की लहरें हैं उतने ही हैं बूँद नयन में !
सब कुछ पाने के बाद भी
कुछ खोने का अहसास है !
उर क्यों अतृप्त है पता नहीं
मन क्यों इन दिनों उदास है ;
कब तलक , कहाँ तक सीधा रस्ता
मिलेगा जीवन में ,
भटक रही है सोच मेरी
मिल गया इसे वनवास है !
शिथिल - सी मेरी चाल देख ताकत - सी आई क्रूर पवन में !
जितनी सागर की लहरें हैं उतने ही हैं बूँद नयन में !
-- संकर्षण गिरि